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चार जज शांत मगर प्रश्न बरक़रार…

सुप्रीम कोर्ट में मचा बवंडर अचानक शांत कर लिया गया है । कोर्ट के वरिष्ठ चार जजों ने एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिये जिन मुद्दों को लेकर अपनी नाराज़गी जाहिर की और मीडिया के सामने आये, अब वो बात भी गुम हो गयी है । सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों का इसतरह खुलेआम आना, अपने आप में ऐतिहासिक कदम था,जिसका किसी ने समर्थन तो किसी ने विरोध किया । ईधर जस्टिस लोया का केस उठाकर उन सभी गंभीर मामलो को रफा दफा कर दिया गया है जिसके लिए चार जजों को सार्वजनिक रूप से सामने आना पड़ा।
जबसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा बने है तबसे सुप्रीम कोर्ट में एक अलग तरह का विवाद और व्यवहार देखा गया है । कुछ दिनों पहले लखनऊ स्थित प्रसाद मेडिकल कॉलेज के एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट में गठित बेंचो और उसको निरस्त करने और एफ आई आर को लेकर जहाँ एक तरफ हंगामा देखा गया,वही दूसरी तरफ जजों को घूसखोरी में संलिप्त भी पाया गया । दूसरा मामला जस्टिस लोया की मृत्यु जांच सम्बंधित बेंचो को गठित करने को लेकर अभी भी लंबित है ।
वैसे तो मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अपने कई बड़े फैसलों के लिए जाने जाते है । लेकिन कुछ महीनो से अफरातफरी में लिए जा रहे फैसलों पर कोर्ट खुद ही बार बार फैसले बदल रही है । उदहारण के तौर पर सिनेमाघरों में राष्ट्रीय गान को अनिवार्य करने के फैसले में पहले कोर्ट ने इसे सख्ती से लागू करने का आदेश दिया और अब सिनेमाघरों से राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है । कुछ और मामलों जैसे निजता और डाटा संरक्षण, आधार कार्ड जैसे बहुत जरुरी मामले कोर्ट में लंबित है जबकि राहुल गांधी को पप्पू , सरदारों पर जोक जैसे गैर जरूरी मामलों पर कोर्ट त्वरित गति से फैसले कर रही है ।
डॉक्टरों की तरह कोर्ट को भी भगवान् का दर्ज़ा दिया गया है और उसका फैसला मानने को हर इंसान बाध्य है। इसलिए न्यायिक व्यवस्था को विधायिका और कार्यपालिका से अलग रखा गया है । हर तरह से नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संविधान का संरक्षण और न्याय की व्यवस्था  को न्यायपालिका ही सुनिश्चित करती है । ऐसे में हम न्यायपालिका को कटघरे में नहीं रख सकते । क्योंकि न्यायालय की अवमानना को अपराध माना जाता है । किसी भी न्यायाधीश की आलोचना या उसके फैसले को न मानना का अधिकार आम नागरिक के पास नहीं है । ऐसे में जब सर्वोच्च कोर्ट के जज ही ये कहे की कोर्ट के भीतर सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है या लोकतंत्र को खतरा है । क्या ऐसी बातें यह सुनिश्चित नहीं करती कि कोर्ट को भी जवाबदेह होना चाहिये ।  क्या महाभियोग के अलावा कोई ऐसा तंत्र विकसित नहीं होना चाहिये जिससे जजों की पारदर्शिता को और मजबूत बनाया जा सके और उनको जवाबदेह बनाया जा सके ? जब वरिष्ठ चार जज सुप्रीम कोर्ट के भीतर के वातावरण से संतुष्ट ना होकर मीडिया के सामने आ सकते है तो क्या आम इंसान को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से संतुष्ट या असंतुष्ट होने का अधिकार नहीं होना चाहिये ? जब वरिष्ठ चार जजों को अपनी बात रखने पर प्रशंसा या निंदा झेलनी पड़ी तो क्या इससे सुप्रीम कोर्ट की सम्मान को क्षति नहीं पहुँची । अगर ये मामला न्यायालय की अवमानना नहीं है तो आम इंसान को भी सुप्रीम कोर्ट के भीतर चल रहे गलत सही कार्यों को खुलकर प्रतिक्रिया देने पर भी न्यायालय की अवमानना का केस नहीं बनाना चाहिये । क्योंकि फैसले गलत सही हो सकते है मगर हर स्थिति में न्याय को सुनिश्चित करना न्यायपालिका का कर्तव्य है ।
चार जजों का मामला कोर्ट का निजी मामला बताया गया , जिसे कोर्ट के भीतर सुलझा लिया गया । मगर कुछ प्रश्न अब भी वही है कि आखिर वरिष्ठ चार जजो को सार्वजानिक रूप से आने पर क्यों मजबूर होना पड़ा । अगर सबकुछ ठीक चल रहा होता तो चार अत्यंत वरिष्ठ जजो को मात्र मतभेद के वजह से मीडिया के सामने इस तरह ना आना पड़ता । यहाँ दो बातें स्पष्ट रूप से दिख रही है पहली ये कि सुप्रीम कोर्ट में कही कुछ गड़बड़ी चल रही है जिससे ये चार जज नाराज़ थे और दूसरा ये कि कोर्ट के जज भी जनतंत्र का चतुर्थ खंभा यानि मीडिया को शक्तिशाली समझते है क्योंकि यही एक ऐसा माध्यम है जिसकी सीधी पहुँच आम आवाम तक है । ऐसे में मीडिया को जनतंत्र को मजबूत बनाने की जिम्मेदारी निभानी चाहिये और उन तमाम सवालों को उठाने का प्रयास किया जाना चाहिए जो शायद वो चार वरिष्ठ जज उठाना चाह रहे थे साथ ही न्यायिक प्रक्रिया में मौजूद खामियों को भी सामने लाकर लोकतंत्र को मजबूत करने में अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए ।
सुप्रीम कोर्ट में अचानक मची खलबली कई सारे सवालो को जन्म दे चुकी है जिसका निराकरण स्वाम सुप्रीम कोर्ट को ही करना होगा  । साथ ही यह भी सोचना होगा कि यदि भविष्य में ऐसी टकराव की स्थिति बनती है तो सुप्रीम कोर्ट इससे कैसे निपटेगा । कोर्ट के भीतर ही भीतरी मामलों की सुनवाई और सजा का कोई विधि भी जल्द ही विकसित कर लेनी चाहिये जससे आगे कभी लोकतंत्र पर प्रहार ना हो और न्यायपालिका पर भरोसा ना टूटे ।

शालिनी श्रीवास्तव
पूर्व रिसर्च एसोसिएट
केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, लखनऊ
व् मुक्त लेखिका

Shalini Srivastava
Shalini Srivastava
I am a writer ,I write because writing is the thing I do best. I write because words live on me and inside of me. I write because I want to write.I write because I feel more. I write because I have got something to say. I write therefore I am a writer.

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