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ये कैसा समाज है…

ये हो क्या गया है हमारे समाज को ,हमारे मूल्यों ,हमारी भावनाओं को | ये कैसा समय है जहाँ  असमर्थ तिल-तिल मर रहे है और समर्थ भी असमर्थ बन गए है | चारों तरफ दुराचार ,भ्रष्टाचार ,हत्या ,शोषण की काली छाया मंडरा रही है | अच्छाई ,सच्चाई का ग्राफ जहाँ तेजी से नीचे गिर रहा है वही झूठ,फरेब,जालसाजी का ग्राफ दिनों दिन ऊपर बढ़ता जा रहा है| लोग अपने ही घरों में महफूज नहीं है | अपने ही अपनों  से डरते है, खौफ खाते है | रिश्तेदारों ,सगे -सम्बन्धियों,पड़ोसियों आदि सबसे विश्वास उठ चूका है| घर से निकलते वक्त इंसान को इस बात का भरोसा नहीं रहता कि वह  सही सलामत घर पहुचेगा या नहीं | दिन दहाड़े लूट ,बलात्कार ,गुंडागर्दी से त्रस्त जनता  हर समय डरी सहमी – नज़र आती  है | दहशत भरे इस माहौल में बस, ऑटो रिक्शा ,ट्रेन आदि सभी जगह खतरे का अंदेशा रहता  है | शिकारी हर जगह घात लगाये शिकारियों को ढूंढते रहते है | नौकरी पेशा युवतियों से लेकर बच्चे – बुजुर्ग तक दहशतगर्दो के शिकार बन रहे है | अपराध सिर चढ़ कर बोल रहा है | ऐसे में कोई किसी से दोस्ती करे तो कैसे और ,अपना कहे तो किसे ?किसी की  मदद कैसे करे और अपनी मदद  के लिए कहाँ जाये? कानून स्वं रक्षक से  भक्षक  बन बैठा है | सुरक्षा के प्रहरी   कहे  जाने  वाले  पुलिस   डिपार्टमेंट के लोग   खुद  ही  अपराध  में  संलिप्त पाए जाते  है | आएदिन  क्राइम  में  इजाफा  होता जा  रहा  है  और  इसकी  सुध  लेने  वाला  कोई  नहीं  है | सरकार  का  ध्यान   केवल  आश्वासन  और  कानून  पारित  करने  तक  सीमित है  और  कानून  का  काम  है  वारदात  होने  के  बाद  हरकत  दिखाना | अगर ऐसा न होता तो वक्त से पहले अपराधी पकड़ा जाता| 

 

 अपराधियों को अब  न तो मीडिया का डर है और  न ही कानून का खौफ | लोकतंत्र कहे जाने वाहे इस देश में लोग ही सुरक्षित नहीं है | 16 दिसम्बर दिल्ली  के घिनौने  कृत्य के बाद भी न तो सरकार के तरफ से कोई ठोस  कदम उठाया गया  और न ही पुलिस प्रसाशन ही चेती है| अगर प्रसाशन वयवस्था चुस्त – दुरुस्त होती तो, शायद इस तरह के घटनाओ से कुछ हद तक निपटा जा सकता था और गुनेह्गारों  को उनकी गुनाहों की सजा ऐन्मौके पर दी जा सकती थी | हालाकि इन समस्याओ को जड़ से खत्म कर देना आसन नहीं है फिर भी अगर दुष्कर्मी  को उसके किये की सजा मिल जाये तो इससे लोकतंत्र की मर्यादा बनी  रह सकती है ,और लोगों का कानून पर भरोसा कायम  रह सकता है |

 प्रत्येक दुष्कर्म के बाद सरकार के तरफ से आने वाले सारे बयान कुछ ही दिनों में  खोखली नज़र आने लगती है और दुष्कर्मी लम्बे समय तक कानून के शिकंजे तक ही  नहीं पहुच पाता है | जहाँ  क्राइम को रोकना ही संभव नहीं हो प्  रहा  है वहां उसे जड़ से मिटने कि बात करना भ्रम  में डालने वाली  कोरी बाते ही है | सिर्फ आश्वासनों,मुवाव्जो और भाषणों  से महिलाओ कि सुरक्षा संभव नहीं है | ठोस  पहल के साथ साथ मानसिकता में बदलाव अब जरूरी हो गया है | जिस देश के  नेता ,विधायक से लेकर बड़े- बड़े पदाधिकारी  तक महिलाओ पर गिद्ध्ध की  नज़र रखते  है उस देश में  महिलाओ की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन ले ? कॉर्पोरेट जगत से लेकर चाय -पानी के स्टाल तक महिलाओ का शोषण हो रहा है | कानून बना देने भर  से महिलाये इन समस्याओ से निजात  नहीं पा सकती |

 लालच और हवश ने इंसान को बहुत नीचे गिरा दिया है| मानवीय मूल्यों कि परवाह किये बगैर इंसान ही इंसान को तबाह करने पर तुला है| नारी अस्मिता का कोई मुल्य नहीं है | अगर  होता तो एक घटना के बाद दुसरे घटना का इतनी सरलता से हो जाना, मुमकिन नहीं था | क्राइम को  रोकना तो दूर की बात है  पीडिता कि मौत के बाद भी अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती  है और वह जुर्म करके बेखौफ घूमता है? ,क्या   यही  है  हमारा आज़ाद  जनतंत्र  -शोषण,भ्रस्टाचार , और क्राइम से सना  हुआ  ? आखिर  कब  तक इन कुकर्मियों  के आगे  नन्ही  गुड़ियों  कि बलि  चढ़ती   रहेगी ,कबतक असुरक्षा के भय से महिलाये घर की चाहरदीवारी  के भीतर कैद रहेंगी  ?

 

शालिनी श्रीवास्तव (लखनऊ )

ईमेल आयडी-lovelysrivastav137@gmail.com

Shalini Srivastava
Shalini Srivastava
I am a writer ,I write because writing is the thing I do best. I write because words live on me and inside of me. I write because I want to write.I write because I feel more. I write because I have got something to say. I write therefore I am a writer.

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