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रट्टू तोता तो नहीं बन गया आपका बच्चा?

यक़ीनन हम प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ रहे है मगर कई अच्छी चीज़े पीछे छूट गयी है । हमारी शिक्षा पद्धति और शिक्षा के स्तर में भले उतरोत्तर विकास की बात कही जा रही हो , लेकिन हक़ीक़त यह है कि स्मार्ट शिक्षा से बच्चे कुशाग्र और नौकरी योग्य तो बन जाते है मगर उनमे व्यक्तिगत अनुशासन, सामाजिक सामंजस्य, नैतिक स्थिरता,भावनात्मक तथा रचनात्मक मजबूती कम होती चली जा रही है । हम स्मार्ट कक्षाओं के माध्यम से उनकी रचनात्मक तथा बौद्धिक वृद्धि व् विकास की बात तो करते है मगर परीक्षा प्रणाली में अंको व् ग्रेडों को लेकर आज भी हमारी मानसिकता वही है । शिक्षक , माता-पिता तथा बच्चे सभी अंको को लेकर  चिंतित दिखते है । मूल्यांकन की पद्धति को आज भी परीक्षा एवं उसके परिणाम से तय किया जाता है ना कि बच्चे की रचनात्मक गतिविधि या व्यवहार से ।
सतत मूल्यांकन की पद्धति को बहुत अच्छा माना जाता है । लेकिन ऐसी व्यवस्था और असल प्रारूप में इसे बहुत कम स्कूलों में लागू किया गया है । आज जिन अच्छे निजी स्कूलों की चर्चा हम करते है उनमें बौद्धिक तथा संपूर्ण विकास के नाम पर ढेर सारे प्रोजेक्टस, दैनिक या साप्ताहिक रंगारंग कार्यक्रम तथा प्रदर्शनियों की भरमार  होती है । जिसमे बच्चे उलझे रहते है और माता-पिता भी बच्चो की  इन व्यस्तताओं को देख और उनके सर्वांगीण विकास के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाते है । शिक्षकों को भी एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी करवाने के लिए रोज़ दबाव बनाया जाता है । ऐसे में शिक्षक बच्चो को वे चीज़ नहीं देते, जिन्हें बच्चो को असल में जरुरत  है । ज्यादातर उच्च कोटि के विद्यालयों में प्रसिद्धि पाने पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया जाता है ना कि बच्चो की अंतरात्मा को निखारने में। ऐसे में बच्चे प्रसिद्धि व् नाम तो कमा लेते है मगर उनके भीतरी पक्ष का संपूर्ण विकास संभव नहीं हो पाता । फलतः आगे आने वाली जिंदगी में वह तनावग्रस्त, अकेलेपन के शिकार जल्दी होते है और कभी-कभी जिंदगी से थक हार कर जिंदगी समाप्त करने के बारे में सोचने लगते है । यह प्रवृत्ति युवाओं में लगातार बढ़ रही है ।
देखा जा रहा है कि आज बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़े लिखे बच्चों के माता-पिता बुढ़ापे में अकेले होते जा रहे है और वृद्धाआश्रमों की संख्या लगातार बढ़ती चली जा रही है। ऐसे नामी स्कूलों से शिक्षित बच्चे ना सिर्फ परिवार बल्कि समाज से कटे रहने में अपनी शान समझते है । अपना दायरा सीमित कर विलाषिता को जीवन का मुख्य आधार बना लेते है । इन स्कूलों से निकले बच्चे पैसा तथा नाम कमाने लायक तो बन जाते हैे मगर रिश्तों एवं जिम्मेदारी में कही पिछड़ जाते है । ऐसे में टूटते बिखरते रिश्ते, भावनात्मक दुर्बलता, सिमटता परिवार, मानसिक रूप से असंतुष्टि तथा असन्तुलित क्रियाविधि आदि आम रूप से देखने को मिलता है । आगे आने वाले समय में इसका और भयावह रूप देखने को मिल सकता है।
निडर होकर बिना सोचे धडाधड़ अंग्रेजी बोलना बच्चो के स्मार्ट और तेज़ होने की पहचान बनती जा रही है । ज्यादा से ज्यादा अंक और उच्च कोटि का ग्रेड हासिल करना सामाजिक प्रतिष्ठा की निशानी बनती जा रही है । उच्च कोटि की सरकारी नौकरी या ज्यादा पैसे वाली नौकरी को हमने अपना स्टेटस सिम्बल बना लिया है और ऐसा मान लिया है कि ये सब हासिल करने वाले लोग ही सफल है । शायद यही वजह है कि छात्र, माता-पिता तथा शिक्षक  सब इन्ही अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश में जुटे हुए है । जबकि गहरी संवेदनाओं को और नैतिक मूल्यों की अवहेलना कर या उनको ना सींच कर हम सब अपने लिए ही एक कमजोर और विक्षिप्त कल के निर्माण के लिए जिम्मेदार है । ऐसे में हम सबको इसके बारे में सोचना होगा । और तय करना होगा की हम शिक्षा के साथ नौकरी और सामाजिक मूल्यों का संवर्धन कैसे करे?
आज बच्चों में रचनात्मक कार्यो को बढ़ावा देने के लिए कई सारी संस्थाएं तथा प्लेटफार्म है जहाँ बच्चे अपनी क्रियाविधि व् योग्यता को आगे बढ़ा सकते है । लेकिन इन चीज़ों की जानकारी ना तो आम माता पिता को है ना तो शिक्षक और बच्चो को । ऐसे में एक साधारण परिवार के बच्चे ज्यादातर परीक्षा में अंकों को लेकर तनावग्रस्त रहते है । और उनको अपनी रचनात्मक गतिविधि को आगे ले जाने के लिए कोई सहारा भी नहीं मिल पाता । जिससे बच्चे कुंठाग्रस्त हो जाते है । ऐसे में जागरूकता की जरुरत है । बच्चों में कौशल विकसित कर एक योग्य नागरिक बनाने की क्षमता एक शिक्षक तथा परिवार में निहित होती है । ये जरुरी नहीं की बहुत महँगे उपकरणों और दुनिया भर के प्रोजेक्ट्स से ही बच्चों में रचनात्मकता व् ज्ञान भरा जाये । भावनात्मक सबलता और सामाजिक कुशलता को ग्रुप क्रियाविधि तथा सामाजिक कार्यों के जरिये भी मजबूत किया जा सकता है । ऐसे तमाम तरीके है जिससे एक बच्चा अच्छा तथा योग्य इंसान बन सकता है जो देश समाज और परिवार तीनो को लेकर आगे बढ़े । परिवार के लोगों को बच्चो में परीक्षा में नम्बरों के लिये भी नहीं बल्कि उसके भीतर पनप रहे रचनात्मकता की पहचान कर आगे बढ़ाने में सहयोग प्रदान करना चाहिये । बचपन से बच्चो को यह सीख ना मिले की उन्हें पैसे कमाने के लिए पढ़ना है बल्कि वो ज्ञान और विकास के लिए पढ़े और कौशल अर्जित करे । सिर्फ ज्ञान को ठूसने और परीक्षा में उड़ेलने की प्रवृति से बाहर निकालकर हम सभी को सोचना होगा । तभी शायद हम खोती संवेदनाओं और मूल्यों को वापस ले पाने में सफल हो सकेंगे ।

शालिनी श्रीवास्तव
पूर्व रिसर्च एसोसिएट
केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान लखनऊ
एवं
मुक्त लेखिका
www.shalinisrvastav.com

 

Shalini Srivastava
Shalini Srivastava
I am a writer ,I write because writing is the thing I do best. I write because words live on me and inside of me. I write because I want to write.I write because I feel more. I write because I have got something to say. I write therefore I am a writer.

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